Amritvani Part 5 (01) Ghungat ke pat khol

July 7, 2015
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अंतःकरण के छल-कपट को घूँघट की संज्ञा दी गयी है। कपट का आवरण दूर करते ही प्रियतम परमात्मा के मिलन का विधान है। भक्ति का दीप जला कर आसन को अचल कर लें, आपके प्रियतम मिलेंगे।

Amritvani Part 5 (02) Avatar

July 7, 2015
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अवतार के विषय में संसार में विलक्षण भ्रान्तियाँ है। वस्तुतः अवतार योगी के हृदय में होता है। जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम हैं, प्रभु का उसी सतह पर उतर आना और आत्मा से अभिग्न होकर मार्गदर्शन करना अवतार की निम्नतम जागृति है। शनैः-शनैः परमात्मामय वातावरण का छा जाना अवतार की पराकाष्ठा है।

Amritvani Part 5 (03) Dhyan

July 7, 2015
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जहाँ चित्त को लगाया जाय, उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। ध्यान किसका करें ? कैसे करें ? इन बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है। नाम, रूप और ब्रह्मविद्या ध्यान के संवाहक हैं।

Amritvani Part 5 (04) Aalam hai udasi ka

July 7, 2015
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यह साधनापरक गजल मिश्रित कव्वाली है। साधना के आरम्भ में ही प्रभु एक झलक दिखा कर चले जाते हैं। तभी तो उन्हें प्राप्त करने की व्याकुलता बढ़ जाती है और साधक प्राप्त करके ही दम लेता है।

Amritvani Part 5 (05) Dhobiya jal bich

July 7, 2015
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यहाँ संत कबीर ने साधक को धोबी की संज्ञा दी, जो अपने जन्म-जन्मांतरों के दागों की धुलाई स्वयं करने में समर्थ है। ब्रह्म उसी के हृदय में है। भक्तिरूपी जल भी उसके हृदय में है। जल के बीच में भी वह प्यासा है। उसकी विधि संतों के पास है। विषयोन्मुख मन को वे प्रभु की ओर उन्मुख कर देते हैं।