Amritvani Part 5 (06) Bandagi ho us shan

July 7, 2015
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पूजन का अर्थ आँख मूँदना नहीं। वंदन उस ऊँचाई का हो कि ज्यों-ज्यों शिर झुके प्रभु की अनुकम्पा उतरती जाय, परिस्थितियों में सुधार होता जाय, ईश्वरीय आलोक में साधक अग्रसर होता रहे।

Amritvani Part 5 (07) Pani bicha min pyasi

July 7, 2015
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पूर्व महर्षियों ने ईश्वर को हृदय-देश में प्राप्त किया। उसी ब्रह्मामृत के मध्य रहकर भी आप प्यासे हैं। क्या करें कि वह मिल जाय-वह विधि इसमें प्रस्तुत है।

Amritvani Part 5 (08) Sasurase gauna ulat chala re

July 7, 2015
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संसार में पड़ा जीव परमात्मा में लव लगाकर अपने स्वरूप नैहर (उद्गम) की ओर चला गया। दृष्टांतों के द्वारा संत कबीर ने जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का चित्रण किया है।

Amritvani Part 5 (09) Ras gagan gufa mein

July 7, 2015
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आरंभिक अवस्था के साधक को भजन में आनन्द नहीं मिलता। किन्तु एक ऐसा स्तर आता है ‘गगन गुफा’, उसमें प्रवेश के साथ ही ‘रस अजर झरे’ जिसका नाम ब्रह्मानन्द है वह अजस्र बहता ही रहता है, ईश्वरीय ध्वनि सुनाई देने लगती है, ईश्वरीय दृष्टिगोचर होने लगता है।

Amritvani Part 5 (10) Pranayam

July 7, 2015
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मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-चतुष्टय अन्तःकरण प्राण कहे जाते हैं। इनके क्रिया-कलाप पर विराम लग जाना प्राणायाम है। मन में न कोई संकल्प उठे और बाह्य वायुमण्डल के संकल्प अन्तःकरण में प्रवेश न कर पायें, इस स्थिति का चित्रण प्राणायाम है।